#Kavita by Kavi Sharad Ajmera Vakil

माँ सरस्वती वंदना++++±++++

 

माँ वागेश्वरी आशीष पाया अब मैं नहीं रूकूंगा ।

रोके चाहे जितना जमाना और आगे मैं चलूंगा ।।

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ये कलम दी महापावनी माँ ने इन हाथों मैं मुझे ।

नतमस्तक हो माँ चरणों  की महिमा मैं लिखूंगा ।।

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तीरों तलवारों से भी कलम धार निराली होती ।

आयेगी माँ आँचल पर आँच अंगारे मैं उगलूंगा ।।

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तन मन आनंद से भर नाच  झूम उठेगा तुम्हारा ।

जब इस कलम से प्रीत प्रभू की मैं लिख दूंगा ।।

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माँ शारदा आशीष “कुसुम” बन मिला आज मुझे ।

फूल “बसंती” हूँ पर अब “कस्तूरी”सा महकूंगा ।।

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***””वकील””**

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