#Kavita by Kavi Sharad Ajmera Vakil

प्राण प्रतिष्ठा की पत्थर में और वो खुदा हो गया.

पत्थर हुआ इंसान का दिल खुद से जुदा हो गया..

 

कमाता रहा ता उम्र शोहरत और दौलत इंसान.

कमाई ना इंसानियत बड़ा ही  वो बेहुदा हो गया..

 

बसा ली बहुत छोटी दुनिया मिंया,बीबी,बच्चों की.

फिक्र ना कि और दुनिया की वो शादीशुदा हो गया..

 

दूसरों की कमियां निकालने में मशगूल रहा इतना.

अपने ऐब गिनाते वक्त वो इंसान बेजुबाँं हो गया..

 

खेरियत ना ली आवाम की उसने जीतने के बाद.

आया चुनाव तो फिर से आवाम पर मेहरबांँ हो गया..

 

कल तक नजर चुरा लेते थे जो उसे देखते ही.

कुर्सी मिलते ही वो रिश्तेदार  खामखाँ हो गया..

 

पालापोषा,पडा़यालिखाया,खून से सींचा माँ बाप ने.

शादी करते ही रिश्तों की बगिया का बागबाँ हो गया.. “”वकील””

 

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