#Kavita by Kavi Sharad Ajmera Vakil

पास थे जो.. वो सब दूर परिवार हो गए हैं.

मोबाइल में जमा सब रिश्तेदार हो गये हैं..

 

ना बधाईपत्र ना पोस्ट कार्ड ना अन्तर्देशीय.

गुजरे जमाने के वो सब व्यापार हो गयें हैं..

 

ट्रांजिस्टर, रेडियो, चौपाल, पटियेबाजी.

खत्म वो मनोरंजन के आधार हो गये हैं..

 

लाइब्रेरी, कामिक्स,किताबें, पत्रिका कहां.

सिमट कर वो ऐप्स में गिरफ्तार हो गए हैं..

 

कबड्डी, खो खो,छुपंछुपाई, दोड़मदोड़ाई.

बच्चे साफ्टवेयर के तलबगार हो गए हैं..

 

होली,दीवाली, दशहरा ढूंढते रह जाओगे.

वेलेंटाइन,रोज डे,आधुनिक त्योहार हो गए हैं **””वकील””***

 

 

 

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