#Kavita by Kavi Sidharth Arjun

तुम इसे कहना बग़ावत या सलीका समझना,,पर हकीकत में उसे हमने भी पत्थर दे मारा,,,,,,,,,

,,,,,,,,,,,,,,,,,,, हाँ मैंने पत्थर मारा ,,,,,,,,,,,,,,,

नेह नीर की गागर फोड़ी,
कैसी तुमने भरी तिज़ोरी,,
हर रिश्ते को दांव चढ़ाकर,
बन बैठा क्यों हत्यारा??
आखिर पत्थर क्यों मारा,,?

नौ नौ मास कोख में रखा,
दुग्ध सुधासम जिसका चखा,,
उसी को ले जाकर तुमने,,
यूँ बृद्धाश्रम में दे मारा,,
आखिर पत्थर क्यों मारा??

सिर की पगड़ी तुझको दे दी,,
दिया शीर्ष और दे दी पेंदी,,,
ऐसा बाप बुढ़ापे में,,,,,,,,,,,,,,
बेटे तो तरसे बेचारा,,
आखिर पत्थर क्यों मारा,,??

प्रेम सुमंगल जिसका साखी,
तोड़ ही डाली तुमने राखी,,,,,
बहन की लाज की फ़िक्र नहीं,,,,,,,
अब कहाँ मिले वो दोबारा,,
आखिर पत्थर क्यों मारा,,????

साथ में खेले साथ में खाये,
साथ में दिन और रात बिताये,,,,
पर कुछ नश्वर दौलत खातिर,
भाई से भी बंटवारा,,,
आखिर पत्थर क्यों मारा?????

जिसके साथ में गुल्ली डंडा,,
यार तेरा वो शोणा सा मुंडा
कहाँ गयी वह प्रीति की रीति जी,,
प्यार कहाँ है अब थारा,,,
आखिर पत्थर क्यों मारा??????

तेरी उमर को रहे जो प्यासी,,
रानी थी पर बनी जो दासी,,,,,,
उस पत्नी को छोड़ के आया
ताके मेरा चौबारा,,,,,,
आखिर पत्थर क्यों मारा,,,,

ये सब प्रश्न उठे जब दिल में
मन न लगा फिर उस महफ़िल में,,,
ऐसे स्वार्थी के सिर पर फिर,,,
हमने भी झट दे मारा,,
हाँ,मैंने पत्थर मारा,,,,,

अब माँ का दुखड़ा न बढ़ेगा,
बाप का ताप न शीश चढ़ेगा,,
मर्यादित होंगे सब रिश्ते,,,,,,,,,,
बुझ जायेगा अंगारा,,,
बस इसीलिये पत्थर मारा,,
हाँ,मैंने पत्थर मारा,,,,,

कवि सिद्धार्थ अर्जुन
9792016971

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