#Kavita by Kirti Tiwari

कितनी जल्दी बड़ी हो जाती है,

वो नन्हीं  सी बेटियां,

या शायद बड़ी कर दी जाती है,

वक्त की जिम्मेदारियों के साथ….

सीख लेती है सारे हिसाब,

पापा के पैसे,मां की दवाइयां,

भाई बहनों की पेन्सिल किताब,

बिंध जाती है घर के कण कण में,

रसोई, छत ,कमरों और आंगन में

बिठाती रहती संतुलन,

स्याही,किताब,चिमटा,बेलन

मन की छुअन,हाथो की तपन

जोड़ लेती है इक कड़ी में,,

आखिर बड़ी हो ही जाती है….

पापा की परियां,

वक्त की जिम्मेदारियों के साथ….

.                                 #कीर्ति

 

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