#Kavita by Kishan Khatri

कुंती का कर्ण

जब आवश्यकता थी
उन्हें सिर पर बिठाया
काम निकल जाने पर
छिटक दिया बीच रास्ते
एकाएक राह रोक दादागिरी करता दिखा
जाति-बिरादरी का प्रश्न
किसी जागीरदार की तरह
तड़ीपार करने और देश निकाले की धमकी देता
आंखें दिखाता, गर्दन मरोड़ता रहा
धर्मी-विधर्मी का मुद्दा

भीड़ इतनी अपरिचित कभी नहीं लगी
हम प्याला-हम निवाला
और लंगोटिया होने का स्वांग भरने वाले
अनजान ही नहीं बने रहे
अपितु ऐसा लगा
जैसे देखते ही खराब हो गया हो
उनके मुँह का जायका
या डर के साये में
कहीं उन्हें भोगनी नहीं पड़ जाए
किसी दूसरे के अपराध की सजा

व्यर्थ हो गया
सही और गलत का प्रश्न
सुदामा और कृष्ण की युक्ति पर भारी दिखी
एकलव्य और द्रोणाचार्य की परम्परा
कभी लगने लगता कि
उसे बना दिया गया कुंती का कर्ण

पर उत्साहित थे चतुर्जन
राजा का कृपापात्र बनने के लिए
उन्हें पता था
राज दरबार से ही निकलती है
रेवड़ियों की नदियाँ
बाजारवाद को सिर -आँखों पर बिठाए
ईनाम-इकरार और मनचाही मुराद की आस में
झोले लिए व्यापारियों के साथ
विरुदावलियों की पोथियाँ उठाए खड़ा था
कवियों ,साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का झुण्ड

घात लगाए मछुआरों से बेखबर
प्रवाह के विरुद्ध तैरती मछलियों का जुनून
कुछ लोगों की अलग दिखती शक्ल
भीड़ से भिन्न होते उनके विचार और व्यवहार
“सर्वे भवन्तु सुखिनः” ही होता उनके मन मस्तिष्क में
उन्हें नहीं होती तालियों की जरूरत
येन केन प्रकारेण भीड़ को इखट्टा करना
नहीं होता उनका मकसद ।

                 किशन कबीरा, राजसमंद।

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