#Kavita by Kishan Kumar Saini

मातृभाषा हिन्दी

अनजाने में कविता पाठ ,
किया करता हूं ।
सब के दिल में जोश नया ,
यूं ही भरता हूँ ।

सब कहते हैं काश !कवि ,
मैं भी बन जाता ।
मैं बोला बन जाओ नाम ,
कमाओ भ्राता ।

कवि ही हिंदी शुद्ध प्रयोग ,
किया करते हैं ।
इसे राष्ट्रभाषा का मान ,
दिया करते हैं ।

हिंदी अपनाने में शर्म ,
हमें क्यों आती ।
इसे मातृभाषा कह के क्या ,
इज्जत जाती ?

अंग्रेजी का शत्रु नहीं हूँ ,
पर हिंदी का ।
प्रबल समर्थक हूं माथे की ,
इस बिंदी का ।

लाज न आये हमको हिंदी ,
अपनाने में ।
“कृष्ण” हमारा वैभव है ,
हिंदी लाने में ।

पाप नहीं ये हिन्दी हम ,
सबकी भाषा है ।
हिंदी से ज़िंदा भारत की ,
अभिलाषा है ।
जय हिन्दी-जय हिन्दुस्तान

कृष्ण कुमार सैनी”राज दौसा,राजस्थान मोबाइल~97855~23855

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