#Kavita by Kumar Sonal

उन्नाव बलात्कार मामला।

 

सब हैं मसगूल बन्दी और चुनाव में,

कौन चिंता करे, क्या हुआ उन्नाव में,

 

सत्ता-रूपी शिलाखंडों से, इंसानियत तार-तार हुआ,

ये नया नहीं है भारत में, ये तो है कई-कई बार हुआ,

 

नहीं इंसान का उसने ये, इंसानियत का बलात्कार किया,

था न्याय माँगने गया पिता जो, उसे भी उसने मार दिया,

 

उनकी नजरों में, केवल दो तुच्छ, जनता ने प्राण गंवाई है,

मेरी नजरों में भारत ने अपनी, स्वर्णिम पहचान गंवाई है,

 

अरे! अब शर्म करो, तुम डूब मरो, जाकर चुल्लू भर पानी में,

कब तक रहोगे यूँ आग लगाते, किसी की हँसती जिंदगानी में,

 

तुम हो कहते खुद को जननेता, और हो बनते दुःखहर्ता,

पर ऐसी हिमाकत तो कोई, जानवर भी है नहीं करता,

 

पुलिस खरीद लो, अदालत खरीद लो, खुदा तेरा हिसाब लेगा,

तेरे हर एक कुकर्मों को, समय-तुला पर तौल इंसाफ देगा,

 

 

 

 

 

 

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