#Kavita by Kumari Archana

“जाने कितने मौसम आये”

 

जाने कितने मौसम आये

और कितने सावन की फूहार बन आये

बाद मुझे पतझड़  बनाकर चल गये !

 

जो रह गया चट्टान सा अटल

बरगद सा अपने शाखायें फैलायें

मुझे अपनी आगोश में माघ सा समेटे रहा

मेरे मन मंदिर को आज भी अपना फागूनी रंग दे रहा !

 

अपनी भिन्नी भिन्नी खुखबूँ से मुझे भदों बना रहा !

 

जिसका नाम ऋतुओं जैसा मझे मुँहजबानी याद रहेगा

जिन्दगीं की अन्तिम साँसों तक!

 

वही एकमात्र प्यार है

बाकी सब आकर्षण मात्र थे !

 

कुमारी अर्चना

पूर्णियाँ,बिहार

 

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