#Kavita by Kumari Archana

सपने रेत ही तो है

पल में बनते

पल में टूट जाते

 

रेत पर बनाये

शीश महल भी

ढेर हो जाते

बालू की तरह

 

फिर मैं यहाँ बैठी तुम्हारा

इंतजार कर रही

तुम तो ना आये

हवा के झोंके की तरह

जाने कहाँ उड़ चले

 

पर ये बिखरे बिखरे

सुलझे सुलझे

रेत तुम से अच्छे है

 

धीरे धीरे तो मैं

इनको जान पाई

प्यार हो गया

मुझे इन रेतो से

 

चाहे कितने ही

आंधी व तूफान आये

ये उड़ कर भी

थोडें मोड़े यही रह जाएगे

अपनी चिन्ह में, पर तुम!

 

मैं इसी रेत पर मरना चाहती

ये भी मुझे प्यार दे सके

अपनी रेत में मुझे

रेत बनाकर!

 

कुमारी अर्चना   = पूर्णियाँ, बिहार

 

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