#Kavita by Kumari Archana

“तुम बिन मैं जीती जागती

लाश हूँ ”

 

साजन तुम हो कि मैं हूँ

तुम बिन मैं जीती जागती लाश हूँ !

मेरा सूरज,चाँद,सितारे सब कुछ तुम हो

मेरी बंदियाँ की चमचमाहट तुम हो

मेरे ओठों की लाली तुम हो

मेरे माथे का कुमकुम तुम हो

 

साजन तुम हो कि मैं हूँ

तुम बिन मैं जीती जागती लाश हूँ!

मेरा ये रूप सिंगार तुम से

मेरी ये हाथों की चुडियाँ तुम से

पाँव का बिछुवा तेरे नाम से

गले का मंगलसूत्र तेरे नाम से

मेरे ये सतरंगी लिबाज तुम से!

साजन तुम हो कि मैं हूँ

तुम बिन जीती जागती लाश हूँ!

जिस पर हर वक्त सफेद कफ़न पड़ी होगी

अगर तुम ना होगें मेरी जिन्दगी में!

मुझ गृहणी का तुम मान हो

तुम  ही मेरा स्वाभिमान हो

तुम मेरे परिवार और समाज में पहचान हो

मैं और तुम गृहस्थी के दो चक्के है

बीच में कोई एक टूट जाता है

दुसरे साथी का जीवन अधुरा हो जाता

मेरे लिए तुम और बच्चें ही मेरा सब कुछ है

मेरी जान इन्हीं में बसती है !

 

इसलिए तुम्हारे जाने के बाद  मेरा सब कुछ एकपल में छिन जाता

बूढापे में घर का पड़ा समान बन जाती हूँ

 

जिन बच्चों को पेट काट काट कर पाली थी

फटा पुराना लत्ता पहन कई वर्षों काटी थी

उन्हीं बच्चों के लिए मैं बोझ बन जाती हूँ

मेरे लिए दो जूनकी रोटी दूशवार हो जाती

अंत में ये जल्दी से क्यों ना मरती

कौन  बैठा है इसकी सेवा करने को

बहू को  सेवा सत्कार  में चक्कर में

रोज रोज आॅफिस हो जाती लेट

पोता पोती मुझसे बात करना समझते बेकार !

 

वो छोड़ आते अनाथालय में

वही पड़ी उनके आने का बाट जोहती हूँ

आँखों  के आँसू को आँचल में जब पोछती हूँ

अखिर में मेरी साँसे भी हार मान लेती है

जो जिन्दगी में  कभी ना हारी थी

क्योंकि तुम्हारे प्यार व विश्वास था मेरे पास

जिसके सहारे मैनें अपनी पहाड़ जैसी जवानी काटी थी

 

इसलिए साजन तुम हो कि मैं हूँ

तुम बिन मैं जिंदा लाश हूँ!

 

कुमारी अर्चना

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