#Kavita by Lokesh Jhikali

आज के सन्त

 

गर्व था भारत भूमि को की महावीर की माता हु

राम कृष्ण और नानक जैसे वीरो की यशगाथा हु

दुर्वासा के कोप से खुद गीता गायक भी डरते थे

पोरस जैसे शूरवीर को नमन सिकन्दर करते थे

भारत माँ का कण कण यु तो गौरव से परिभाषित है

सन्त ऋषि और सन्यासियो के तप से जग प्रकाशित है

इसी धरा पर दशरथ नन्दन की मर्यादा बसती है

बुद्ध महात्मा की बाणी जनमानस में हँसती है

रत्नाकर ने वाल्मीकि बन रामायण लिख डाली थी

अगस्त्य ने देह दान कर लुटती धरा बचाली थी

संदीपन के तप ने केशव को भगवान बनाया था

अंधे सूरदास ने सबको माधव प्रेम सुनाया था

तुलसी की मानस पढ़ते ही रोम रोम खिल जाती है

केवल राम नाम जपने से ही जन्नत मिल जाती है

सन्तों की पहचान बनी है नानक और कबीरा से

और कौन अनजाना है उस भक्त शिरोमणि मीरा से

एक शीला में जीवन आ जाता था जिसके पेरो से

उस रघुनन्दन की भूख मिटी शबरी के जूठे बेरो से

ध्रुव भी ध्यान साधना के कारण उत्तर में चमक रहा

उपनिषदों का ज्ञान देश की दशो दिशो में दमक रहा

लेकिन अब वो सन्त कहाँ है,कहाँ वह मर्यादा है

ढोंगी बाबा सन्त शब्द की परिभाषा से ज्यादा है

राम नाम जपते जपते जो दब जाते थे ढेलों में

उस परम्परा के सन्त पड़े है अपराधी बन जेलो में

शर्मनाक प्रमाण मिले है बाबाओ के डेरो से

भोगी बनकर लिपट पड़े है वेश्याओ के पेरो में

 

कवि लोकेश झीकली

राजपा प्रवक्ता

जहाजपुर भीलवाड़ा

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