#Kavita by Lokesh Jhikli

मजबूर लड़की

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दृगो मे गम का नीर था चेहरे पे धुप थी

दिखने मे साक्षात देवी का स्वरुप थी

मुस्कान से खतरा था जवानो की जान को

वाणी मे मिला आसरा सरगम की तान को

अजान मे मस्तक दिये अनिमेष बेठी थी

नीरव थी,लाचार थी किस्मत की हेठी थी

जुन्हाई रातो मे वो थी विहाग गा रही

निज वेदना लाचारी पर आँसु बहा रही

नादान का हर वक्त खेल मे गुजर गया

आखो के समक्ष सारा परिवार गुजर गया

बचपन मे ही मा बाप से बिछोह हो गया

फिर बाद मे भाई का तन भी रुह खो गया

समझा नही कुदरत ने क्यो अन्याय ये किया?

मासूम के सग रब ने केसा न्याय ये किया?

ना दिन मे पाया चेन ना रातो मे सोई है

दुनिया की भीड बिच मे उसका ना कोई है

विस्वास ही सखा था और हिम्मत ही मात थी

शाखो से टुटी बेसहारा उडती पात थी

बचपन मे ही शिक्षा से वो अन्जान हो गई

हालात से लड़ते हुऐ जवान हो गई

जवानी पर जवानो की नजरे हो गई भारी

कल तक ना जिसका था कोई सबकी है वो प्यारी

हेवान से ले नेह-सुरा का पान कर लिया

हो बेखबर आशिक का उसने ध्यान धर लिया

सिन्धु मे ज्यो सलिल की वो मीन हो गई

दुनिया को भूल उसमे ही विलिन हो गई

वाकिफ नही थी पर वो इश्क के अन्जाम से

इश्क की तनहाई से,खता के दाम से

वो सोप देगी रूह उसे उसकी ये चाह थी

पर आदमी की सिर्फ बदन पर निगाह थी

ख्वाबो से था आबाद दिल विरान हो गया

वो छोड़कर मझधार अन्तर्धान हो गया

नादान थी पिड़ा पे पिड़ा झेल ना सकी

किस्मत की लकिरो से खेल, खेल ना सकी

तमाशबिन दुनिया थी, किस्मत का खेल था

अधराहो मे बिछुड़ गया कैसा ये मेल था

बेबस के पास कोई भी निदान नही था

तमाशबिन कोई भी हैरान नही था

दुनिया मे किस्से तो अब आम बात है

अपना बना के लोग यु करते आघात है

कष्टो के वज्रपात से हिम्मत ना हारी थी

पर इश्क की खता ने जिजीविषा मारी थी

मेने भी सोचा कल मे उसके पास जाऊगा

पर ये नही सोचा की उसकी लास पाऊगा

कष्टो से,हालातो से अन्तिम सास लड़ी थी

कल रात चौराहे पर उसकी लास पड़ी थी

गुलशन से दुर हो गई थी फुल की कली

मुठ्ठी भीच रह गया लोकेश ‘झीकली’

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