#Kavita Madan Mohan Sharma Sajal

सुख की बारिशें हो हर घर में
प्रेम की चाहत हो हर घर में
न हो कहीं व्यापार घृणा का
न हो अपना पराया जमाने भर में,
अक्सर सोचता हूँ मैं।

न पनपे कहीं अविश्वास की खाईयां
न उगे कहीं भी नफरत की झाड़ियां
दिलों में फूटे उल्लसित नेह के नगमे
न हो जमीं पर अवसाद की परछाइयां,
अक्सर सोचता हूँ मैं।

प्रीत की डोरी में बंध जाए सभी
रातें सुख नींद में ढल जाए सभी
गले मिल जाये छोड़ सारे बंधन
बिछोह के उनींदे पल जाए सभी।
अक्सर सोचता हूँ मैं।

अंधेरों की खिलाफत सब करे
जुल्मों से लड़े बगावत सब करे
जो लगे है नोंचने मानवता को ही
उनके खिलाफ हरारत सब करे
अक्सर सोचता हूँ मैं।

इंसानियत हो धर्म सबका यहाँ
सफल जीवन कर्म सबका यहाँ
राष्ट्र के प्रति चिंतन करे सब
उन्नति सबकी मर्म हो सबका यहाँ।
अक्सर सोचता हूँ मैं।
★★★★★★★★★★★★
मदन मोहन शर्मा ‘सजल’
कोटा, (राज0)

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