#Kavita By Madan Mohan Sharma Sajal

खुद जले होते

काश! प्यार करने वाले मोम के बने होते,
पिघल कर एक दूसरे में मिले तो होते।

काश! सदा एक ही डाली के फूल बने होते,
कांटो के बीच गुस्ताखी से खिले तो होते।

काश! तोड़ देते जमाने की बेदर्द बेडियाँ,
पत्थरों से कठोर दिल कुछ हिले तो होते।

काश! न होती तन्हाईयाँ न गिला शिकवा,
कुछ तो दिल दुश्मनों के होठ सिले तो होते।

काश! न होती वीरानियाँ न रूसवाईयाँ,
चिराग-ए-इश्क में खुद जले तो होते।

मदन मोहन शर्मा ‘सजल’
कोटा (राज0)

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