#Kavita By Madan Mohan Sharma Sajal

सुहाना पागलपन

वह निहारती है तो मैं
नजरें झुका लेता हूं,
वह हया के परदे में
सिमट जाती है जब मैं
उसे एकटक देखता हूं,
शबनम सी लरजती
अंतर्मन से प्रस्फुटित होती
भावनाओं का कोमल स्पर्श
मदहोश करती अभिलाषा
आँखों से नूर बनकर
टप-टप टपकती है,
पर खामोश।

थरथराते है होंठ
करने लगता हूँ इज़हार
प्यार का
अठखेलियां करती प्रेम इच्छाएं
लालायित है,
प्रियतम से गुफ्तगूं करने को,
पर खामोश।

कभी न खत्म होने वाला सन्नाटा
बिखरा पड़ा है हमारे चारों ओर,
जो एहसास है बेदर्द ज़माने का।
वह भी खामोश !
मैं भी खामोश !!
दोनों खामोश !!!
और खामोशी से देखते है
एक दूसरे को हसरत लिए,
देखते रहे, देखते रहे, देखते रहे।
वाह री मोहब्बत –
वह भी पगली !
मैं भी पगला !!
दोनों पगले !!!
★★★★★★★★★★★★
मदन मोहन शर्मा ‘सजल’

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