#Kavita by Madan Mohan Sharma Sajal

धर्म
★★★
पूछा मैंने
एक दिन वृक्ष से
तुम्हारा धर्म क्या है ?
शीतल छांव, मीठे फल
रंग बिरंगे पुष्प
और प्राणी जगत को
जीवनदान देना।
हवा से पूछा-
मुस्कराकर इठलाकर बोली-
भरती हूं मैं प्राणवायु
कण-कण में
नस-नस में
देती हूं प्राणदान।
इसी सवाल पर
धरती,आकाश, नदी,अम्बर,
सूर्य, चंद्रमा
सबका एक ही जवाब-
हमारे पास जो कुछ है
सब प्राणी जगत के लिये।
यही सवाल पूछा
आज के आदमी से
मेरे सवाल को सुनकर वह चौंका
फिर सहज स्वर में बोला
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई।
मुझे याद आता है
महाकवि तुलसीदास का कथन
“परहित सरिस धर्म नही भाई,
परपीड़ा सम नही अधमाई।”
जो आज भी रामचरित मानस
के पन्ने में सिसक रहा है।
पता नही कब सार्थक होगी
ये पंक्तियाँ ???
★★★★★★★★★★★★
मदन मोहन शर्मा ‘सजल’
कोटा, (राज0)

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