#Kavita by Madan Mohan Sharma Sajal

सच में, बच्चे समझदार हो गए है
★★★★★★★★★★★
बुढ़ापे की कराहटें
अब उन्हें नहीं सुनाई देती,
आंख मूंद लेते है
जिम्मेदारियों से,
टल कर निकल जाते है
बिना पदचाप किए,
तमाम रिश्ते जार-जार हो गये है,
सच में, बच्चे समझदार हो गए है।

नजर में जिनको बसाया
नजर चुराने लगे हैं,
एक जाना पहचाना डर
खाये जाता है
उनके अंतर्मन को,
कहीं दवाइयों की
प्रिसक्रिप्शन लिस्ट न थमा दे
यह पूछते ही –
पापा कैसी तबीयत है ?
बिना आहट के गुजर जाते हैं,
नीची गर्दन किए अपने कमरे में,
बदले-बदले से व्यवहार हो गए है,
सच में, बच्चे समझदार हो गए है।

कमरों से फुसफुसाने की
आवाजें आती है
जो भंग कर देती है मेरी तंद्रा को,
कभी स्पष्ट तो कभी अस्पष्ट
सुनाई देती है उनकी पत्नियों,
बच्चों की फरमाइशें,
पूरी होने पर खिलखिलाहटें,
मुस्कुराते चेहरे नजर आते हैं
आंगन में कई दिनों तक,
और पिता का फटा कुर्ता
मां की पैबंद लगी साड़ी
अनमने से बतियाते महसूस होते है
दीवार की खूंटी पर,
सारे सुहाने सपन तार-तार हो गए है,
सच में, बच्चे समझदार हो गए है।

खाने की टेबल पर अब
अक्सर सन्नाटा रहता है,
जहां कभी हंसी के
फव्वारे चलते थे,
जरूरतों की बातें होती थी,
घर को घर कैसे बनाना है,
बच्चों की फीस,
आवश्यकता के सामान,
नए रिश्तों की बुनियाद,
सेहत से संबंधित हिदायतें
बच्चे इन सबको
अपने-अपने कमरों में ले गए है
एक-एक करके, खामोशियां
तन्हाईयां पहरेदार हो गए है,
सच में, बच्चे समझदार हो गए है।

खूसट, बुढ़ऊ, सठिया गए हैं,
काम के न धाम के, सेर भर अनाज के
आदि-आदि उपनाम,मुहावरे
संबोधन के पर्याय हो गए हैं
भौतिक चकाचौंध ने
मर्यादाओं को नंगा कर दिया है
संस्कार निर्लज्जता की
अंधेरी वादियों में खो गए हैं
प्रेम में नफरत के कांटे असरदार हो गए है
सच में, बच्चे समझदार हो गए है।
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
मदन मोहन शर्मा ‘सजल’
कोटा, (राज0)

One thought on “#Kavita by Madan Mohan Sharma Sajal

  • October 13, 2018 at 6:27 am
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    Very nice line sir ji

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