#Kavita by Madhu Mugdha

मेरी जिन्दगी की एक क्ल्पना

हाे तुम …….

मैं नहीं जानती, ना बता सकती हूँ ,

कि तुम कौन हो .

जिस समय मैं टुकड़ों में टूट कर

चूर-चूर होकर बिख़र रही थी,

उस समय तुम ही थे ….

जो मेरे मिटते वजूद को फिर से

जिवित कर रहे थे…

आज भी तुम्हारी…

उपस्थिति और समीपता को

महसूस करती हूँ । ..

आजकल न जाने कहाँ खो

जाती हूँ…

तुम मेरी सोच हो ,

मेरी कल्पना हो तुम….

तुम्हे शब्दो मे पढ़ा है मैने ..

तुम मेरे लेखन की एक जीवंत आवाज हो तुम

मेरे जिने का आधार हो तुम

मेरे गिरते हुये मकान के स्तम्भ हो तुम

हां मेरी कल्पना हो तुम

…………………………………#मधु [मुग्धा ]

242 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *