#Kavita by Madhusudan Gautam

*भीगी पलको की कलम घिसाई *
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तुमारी जंग खत्म हुई।

मेरी तो अब शुरू हुई।

तुम चले गए , विजेता बनकर।

हर्षित हूँ तुमारा,यशगान सुनकर,

फख्र है फ़िकर भी,

गर्व है पर दर्द भी।

अकेली तो पहले भी,

कई रात तन्हा सोई हूँ।

तुम्हैं मैं याद कर रोई हूँ।

पर वो रूदन अलग था,

तुमारे मीठे बोलो का संग था।

सो आराम से रह जाती थी।

तुम आओगे उम्मीद थी,

सब दर्द सह जाती थी।

और जब तुम आते थे।

सभी मौसम भाते थे।

अब बात अलग है ।

जीवन विलग है।

बाहर बारिश की,

पटर पटर पट पट,

दूसरे कमरों में

खटर पटर खट खट,

कुछ अच्छी नही लगती।

रुत कोई सी भी नहीं रुचती।

तुमारी यादे रोने नहीं देती,

जिम्मेदारियां हँसने नहीं देती।

तिरंगे में लिपटे हुए तुम,

आँखों में समाए हुए हो।

चले गए पर ,,,

वन्दे मातरम,जय हिंद,

भारत माता की जय,

सब नाद गूंजते है कान में,

अजीब शांति है पर मकान में।

टूटी नही हूँ,फूटी नही हूँ।

तुम रूठ गये जहाँ से,

मैं रूठी नही हूँ।

पर नारी तो हूँ ना

अनूठी नहीं हूँ।

भान है मुझे तुमारे नाम का,

अपने सम्मान का,

जो छोड़ कर गए हो,

उस नन्ही सी जान का।

कुछ भी करूँगी ,

जिऊंगी मरूँगी।

पर फुटपाथ पर ,

बेचने नहीं दूंगी तिरंगा,

तुमारी अमानत को,…..

मधुसूदन गौतम

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