#Kavita by Madhusudan Gautm

अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियां
212 212 212 212
तू दबे पाँव चोरी छिपे से न आ।
सामने वार कर फिर मुझे आजमा।
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बिना समान्त के पदान्त आ स्वर

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मेरी कलम घिसाई
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हारने जीतने का नही प्रश्न था।
मौत जीती भले , हार मैं कब थमा।

साँस छूटी तो सांसो ने मुझसे कहा।
हम रहेंगे कहाँ, इतना हमको बता।

साथ इतना ही था, सच अटल जी भले।
राह तकती रहेंगी मगर हम सदा।

जब भी आओ दुबारा तो मिलना हमें।
याद में हम तुम्हारी खुद को देंगी मिटा।

मौत डरती रही,साँस चलती रही।
कारवां मौत का, यूँ ही बढ़ता रहा।

खा तरस मौत पर, पास आने दिया।
इस तरह ज़िन्दगी को भी रुसवा किया।

होंसला था बहुत ,वक्त उतना नहीं।
वक्त की ही वज़ह से ही झुकना पड़ा।

नाम मेरा अटल था तो टलता कहाँ।
आन भी नाम की मुझको रखना पड़ा।

मौज मचली नहीं दरिया थम सा गया।
गंग का नीर भी देखो जम सा गया।

रार ठानी नही,हार मानी नहीं
मौत से पर फरिश्ता बड़ा हो गया।

मौत की वो उमर जो दो पल भी नहीं।
जी उसे पल दो पल में जवां हो गया।
मौत से बेखबर,ज़िन्दगी का सफर।
करके पूरा वो हमसे जुदा हो गया।

प्यार इतना उन्हें सब जगह से मिला।
क्या नफ़ा फायदा यह तो जाने खुदा।
ले चुनोती लड़ा जीत आगे बढ़ा।
अन्त में बुझ गया,वो अटल सा दिया।
एक तूफ़ान देखो गुज़र ही गया।
जिसने किश्ती को आखिर डुबो ही दिया।
मौत से ठन गई, जान आखिर गई।
नाम जग में मगर ये अटल हो गया।
मधुसूदन गौतम

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