#Kavita by Mahendra Mishra Mohit

जानता हूँ

मुझे कोई हक़ नहीं

तुम्हारी तस्वीर को देखने का

तुम्हारे बिखरे बालों में खोने का

तुम्हारे लाल गाल

और वो आंखें

डूब जाना चाहता हूँ मैं उनमे

तुम्हारे सुर्ख होठ

खुश हो जाता हूँ तुम्हें मुस्कुराते देख

चूम लेता हूँ तुम्हारा माथा मैं

ताकि बता सकूँ

फ़िक्र होती है मुझे तुम्हारी।

 

याद आती हो तुम

बस यही तस्वीर तो है

गले लगाकर रोता हूँ इन्हें

चीख़ता है हृदय मेरा

पर दब जाती है

आंसुओं से लिपटी गर्म साँसों में मेरी आवाज।

 

याद आता है हर वो पल

जिनमें तुम हो

तुम्हारी बातें

तुम्हारे सपने

तुम्हारा दर्द

तुम्हारी हँसी

और वो गीत

अक्सर ही गुनगुनाती थी जिसे।

 

कभी तो आओगी

इन बन्धनों को तोड़कर

मेरे पास।

 

देख लेना आकर

उस वक़्त जब अंतिम साँसे चल रही होंगी मेरी

मैं फिर पुकारूंगा तुम्हें

खुली रहेंगी मेरी आँखें

तुम्हारे दीदार को

तुम्हारे इंतजार में

तुम्हारे प्यार में।

 

 

-मोहित

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