#Kavita by Mamchand Agrwal Vasant

दोहे

देख पड़ोसी की खुशी, होना नहीं उदास।

कर्म किए जा एक दिन,आएगा मधुमास।।

 

जग में सुंदर मात से,और न कोई नार।

है प्रणम्य हर हाल में,गाली दे या प्यार।।

 

कवि के हाथों की कलम,कलम नहीं है तात।

ऊँच-नीच समतल करे,है कुदाल यह भ्रात।।

 

चूड़ी पहनी हाथ में,सज सोलह श्रृंगार।

साजन जी करने लगे,सजनी की मनुहार।।

 

खन-खन करती चूड़ियाँ,मेघ सरीखे बाल।

रंक हृदय को कर रही,बाला,मालामाल।।

 

करे इशारे चूड़ियाँ,बोले मीठे बैन।

सजन अगर समझे नहीं, मदमाते से नैन।।

 

सुरसरि के तट मैं खड़ा,कूदन को तैयार।

पार गया तो पार है,डूब गया तो पार।।

 

बिना प्यार संसार में,कहाँ बचेगा सार।

प्यार करें संसारसे,तज कर सब तकरार।।

 

तेरह,ग्यारह पर ठहर,रखें अंत में मान।

जगण तजें आरंभ में,दोहा लिखें सुजान।।

 

जो देखा सो लिख दिया, निर्भय,निस्संकोच।

अब इसकी चिंता नहीं, लोग रहे क्या सोच।।

-मामचंद अग्रवाल वसंत

जमशेदपुर,09334805484

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