#Kavita by Manish Kumar Pathak

ये दिन भी कैसे दिन है
रातें तन्हाइयाँ लेकर आती है
पूरे कमरे में अँधेरा छा जाता है
ख़ामोश हो जाती है दर-ओ-दीवारे सारी
किसी से गुफ्तगु की गुंजाइश नहीं बनती ।

बस एक मध्यम से रोशनी के सहारे एक लालटेन जलते रहता है ।
उसी मध्यम रोशनी में मैं तुम्हारे सारे ख़त निकालकर मैं उसके हर्फ -हर्फ पढ़ने लगता हूँ।

जिसमें तुम्हारे आने की तारीख़ लिखी रहती थी तुम्हें याद है जब मैं तुमको
रिसीव करने स्टेशन तक आता था ।

सारी आने जाने वाली गाड़ियों को घंटो तक कर तेरा इंतजार किया करता था ।
फिर अचानक तुझ पर नजर होती थी
तेरे पास सामान तो बहुत होता था हर बार

हर बार तुम्हारा मैं कुली बन जाता था
तुम से गुफ्तगू करते हुए गप्पे लड़ाते हुए
थोड़ा सा हंसते हंसाते हुए
मैं तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ देता था

वह धूल से लिपटी हुई गांव की सड़कें जिसमें दो जिस्म एक साथ चलते थे पैरों के निशां मिट्टी पर पड़ते थे

मैं सुई बन जाता था
और तुम धागा फिर सैकड़ो दरारें पड़ती थी
सैकड़ों पैबंद लगते थे

मैं अधूरा हो जाता था
और तुम मुकम्मल हो जाती थी ।

अब लालटेन की लौ शायद बुझने वाली है अब शायद तेल खत्म होने वाला है।
अब तेरा मेरा मेल खत्म होने वाला है ।

गाँड़ियां तो अभी आती है स्टेशन पर
मैं रोज उन गाड़ियों को टकटकी बांधकर देखा करता हू

कि शायद हजारों की भीड़ में से एक दिन निकल जाए तेरा ही चेहरा मैं अब भी कुली हूँ
ढोता रहता हूं तुम्हारी यादों को दिन रात

तुम्हें भूल जाने की कशमकश में मैं रोज तुझको याद करता हूं।

यहाँ लालटेन तो नहीं है पर प्लेटफॉर्म पर लगे लाइट के नीचे बैठ कर मैं
पढ़ता रहता हूँ।
तुम्हारे ख़त सारे

पर किसी भी ख़त में तेरी तस्वीर नहीं मिलती तुमने ही तो कहा था
इश्क सिर्फ एक एहसास है
इसमें किसी को जागीर नहीं मिलती ।

किसी ने मेरी कस्तूरी चुरा ली है तब से ही मैं भटक रहा हूँ ।
दर्द जुदाई का प्याला मैं गटक रहा हूँ।

यहां पास ही हमारे इर्द-गिर्द कुछ दोस्त हैं हमारे जो वफादार बहुत हैं
जब मैं फूट-फूट कर रोने लगता हूँ।

तो अपने चिरपरिचित आवाजों में भोंकते हुए वो मुझसे कहते हैं ।

तुम्हें भी वो हो गया है
जो सबको नहीं होता
जिस्म से रूह कभी नहीं खोता
वह सिर्फ तुम्हारी है तो
लौट कर आएगी एक दिन
ऐसे बच्चों की तरह कोई नहीं रोता

फिर से रेलगाड़ी सायरन बज उठती है
सूरज की पहली रोशनी
मेरे औंधे से जिस्म पर पड़ती है ।
मैं फिर से निकल जाता हूँ
अपना कस्तूरी ढूंढने

मनीष कुमार पाठक द्वारा लिखित mob no 8849828749

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