#Kavita by Manorama Ratley

मां

वृद्धाआश्रम में रहकर भी
माँ संतान सप्तमी रहती है

हो जाये ना बच्चे का अनिष्ट
यही सोच प्रभु को भजती है

दुनिया का उसे कोई मोह नहीं
पर उससे वो मोह करती है

आशा का दीप जलाकर
देहरी पर  बैठा करती है

उसकी गल्तियो पर भी
वो किस्मत को दोष ही देती है

बच्चा तो मेरा बड़ा ही प्यारा
कहकर वो हँस देती है

उसके लिए खुशिया माँग
वो दुनिया से विदा ले लेती है

अपना सरवस्व न्यौछावर कर
वह कभी किसी से ना कुछ लेती है

ऐसी दुनिया में केवल माँ ही होती है
जो हर दुख में पहले याद आती है

माँ तुझे प्रणाम
मनोरमा रतले

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