#Kavita by Manorma Ratley

देह ..

 

क्यों मैने सदा

इस देह के बारे में सोचा..

मैने क्या….?

सारे जग ने….।

क्या इस देह के आगे…

मन ,आत्मा…

का कोई मूल्य नहीं…

तो फिर….

जान बूझकर हम…

अमूल्य आत्मा …

और मन का …

क्यों…?

तिरस्कार सा करते है..

इस तन को सजाने…

सँवारने में सारी…

ताकत झोक देते..

और जो निर्मल मन

और आत्मा जो…

हमें परमात्मा से …

मिलाने वाली ..उसके लिये

कोई प्रयास नहीं करते…

इसी कारण समाज का…

नैतिक पतन हो रहा है…

जिसके हम ही उत्तरादायी है…।

बस जहा देखो….

देह का प्रदर्शन…

क्या स्त्री ..क्या पुरूष…

और क्या बच्चे….

सभी होड़ में है..।

ऐसा लगता है…

पशु बनकर ही मानेगे…

निवस्त्र….स्वछंद प्रवृत्ति

का कोई अंत नहीं…

किसी के पास समय ही नहीं…

क्या गैरो के लिये…

क्या खुद के लिये..

चिंतन करते नहीं…।

और जब मत्यु से सामना होता….

तब सुध लेते…..

कि हे भगवान मैने..।

इस आत्मा और मन की…

तो कभी सुनी नहीं…

वो मुझे आगाह..करते रहे

पर मै…।

तो लगी में था मस्त…

और अब समय नहीं…

कि मै कुछ कर सकू…

जो अमर थी ,अमर है

उसका मैने ..।

मूल्य ना जाना…

जिसे लोग जानेगे…

और जो मेरे साथ..।

नष्ट हो जाऐगी…

उसीके..गुरूर मे जिया..।

काश ये सब समय…

रहते हम सब जान ले तो..।

कितना अच्छा हो..।।

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