#Kavita by Manorma Ratley

पवित्रता

 

क्या गाँव..

क्या शहर ..

क्या नगर ..

क्या महानगर…

सबकी अब एक सी…

मानसिकता…

वहीं ओछी….

सड़ी गली…

विकृत…

इसमें ..तो हम

सबके बराबर हो गये

बिन किसी भेदभाव के…

लेकिन और कुछ ना सीखा…

इन नगरो ,महानगरो से…

क्यों……

बस गंदी मानसिकता ले ली…

छोड़ अपनी संस्कृति…

अब बेटी को …

कन्या रूप मे नहीं…

बेटी रूप में नहीं…

बस एक ही रुप मे..

देखने लगे..।.

वो है स्त्री का वो रूप

जो तुम्हारी वासना…

के काम आ सकता है..

और तुम…वहशी..

दरिंदे…

की तरह …

दानव बनकर…

वो कर जाते हो..

जिससे…

सारी मानवता को..

शरमार होना पड़ता है…

क्यों नहीं अपने…

में अंकुश लगाते…

कही …ऐसा ना हो…

कभी ऐसा ही…

जब तुम्हारी ..।

बहन बेटी..।

के साथ …हो..

तब तुम….

इन्हें सरेआम फाँसी पर…

लटकाना सोचो..?

जब वो कल…

तो आज …से ही करे…

अभी से ही..

इन विषैले साँपो के…

फनो को इस तरह …

कुचले…

की अब कोई …

ऐसा करने….

या देखने के बारे…

में सोच भी ना सके

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.