#Kavita by Manorma Ratley

हमारी परंपरा हमारी विरासत है

और हमारा इतिहास हमारा गौरव

तो फिर कुछ लोग…..

अपने स्वार्थ की खातिर…

अपनी ओछी मानसिकता के चलते

क्यों …?

हमारे इतिहास से …

छेड़छाड़ करते है

अपनी मनमानी करते है

बिना किसी रोक टोक के…

आखिर कब तक…..

और क्यों….

ये दंनश हम क्यों सह रहे….

क्या ये लोग…..

इस देश का ,…..

समाज का….

हिस्सा नहीं …..

अगर है तो….

फिर इस तरह की…

हरकत का क्या मतलब…

वो भी….

वीरंगनाओ के चरित्र की…

शर्म आनी चाहिए हमें….

कि हमारी वीरंगनाओ के बारे में…

कोई कुछ भी पेश करता है…

और समाज बैठा बैठा …

देखता रहता है …

क्या ये सचमुच…

ये अंधे बहरो का समाज है…

या फिर……

आप सुखी ,संसार सुखी को मनाने वाला

या फिर …..

अपने लिए नहीं वरन्,दूजे के लिये जियो वाला

क्यों हमारे अपने……

ही अपनो को लूटने लगे है

आज इस घटिया …..

सोच के समाज मे ….

परिणाम सामने है….

समाज का विघटन हो रहा है

अब देश भक्त ….

वीरंगनाऐ….

शायद देश के गौरव नहीं

तभी तो….

ये सब हो पा रहा है

टके सेर आलू ..

और

टके सेर खाजा मिल रहा है

मनोरंजन के नाम पर

सब को एक तराजू में

तौला  जा रहा है….

चेतो…..

अब भी देर नहीं….

चेतो…

नहीं….तो

वो दिन दूर नहीं….

जब हमारे धार्मिक पात्रों को भी

वे अपनी मरजी अनुसार….

प्रस्तुत करेंगे …

और हम …

मौन रहे ….

देखते रहेंगे.

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