#Kavita by Mast Prakash Panchal

बस यूँ ही … जैसा दिखा ,बस वो लिख दिया

 

आखिर होते कौन हो तुम,

इंसान की परिभाषा देने वाले।

 

कभी जाति के नाम पर

कभी धर्म के नाम पर।

 

दलित और दबंग

इंसान की परिभाषा देने वाले।

 

नहीं सीखाता कोई भी धर्म,

इंसान को इंसान ही नोचे

 

कभी कर्म के नाम पर

कभी जाति के नाम पर।

 

पता है मुझे कुछ लोग तिलमिलायेगे।

अपन इंसानियत की बात करेंगे।

 

देखता हूँ आज भी गाँवों मे

अभी भी मानसिकता जकङी है पाँवो में।

 

बुलावा भेजेंगे शादी ब्याव में

पडोसी होने के नाते।

खानपान की खातिर

फिर ये अलग टेंट क्यूँ लगवाते।

 

तुम्हारे घर की नींव किसने भरी।

उन इमारतों को खङे करने वाले कौन थे

 

वो मजदूर वो कारीगर

कौन थे

उस वक्त आप सब मौन थे

 

कैसे होता है घर का शुद्धिकरण।

दलित घर में आए तो हो जाता है अशुद्धिकरण ।

 

चलो जो भी है  सुधार होना चाहिए।

दिल मे एक हिन्दूस्तान होना चाहिए। ।

 

स्वरचित– मस्त प्रकाश पांचाल

 

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