#Kavita by Mast Prakash Panchal

…इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं।
जिन्हें हम सब सपनों के पंख कहते हैं।
इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं। ।

जिन्हें हम सब अपनी अपनी पहचान कहते है।
इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं। ।

भूखे पेट नंगे पाँव जो दर्द सहते है
इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं। ।

हंसी हिम्मत हौसला जिसमें वो रहते हैं।
इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं। ।

वे इंसान भाग्यशाली होते हैं
जिनके पास माता-पिता रहते हैं
इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं। ।

वो उपवन जिस में रंग बिरंगे फूल है और रिश्तों के झरने बहते हैं।
इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं। ।

पिताजी घर के आँगन वो पेड़ होता है
जिसकी छाया में हम खेलते कूदते हैं ।
इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं। ।

कुछ पल पास बैठकर बीता दीजिए।
बाद में जो करना है वो कीजिए।।

दिन में एक बार उन्हें हंसा के देख लिजिए।
फिर जिन्दगी भर मौज कीजिए।।

पापा बोल ने पर पुरा मुंह खुलता है।
…इसलिए शायद उन्हें पिता जी कहते हैं।

स्वरचित— मस्त प्रकाश पांचाल

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