#Kavita by Mohan Srivastava

वन स्मृति

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हरित वसन स्मित वन प्रांगण

मनभावन मृदु स्मृतियाँ ।

झरझर झरझर झरते झरने

कलकल कल गाती नंदियाँ ।।

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सुंदर सुखद वृक्ष वृंदों में

पुष्पों पर मधुपों का डेरा ।

कोयल  कूहकूह आंदोलित

करती फिरती शब्दचितेरा ।।

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रंगबिरंगे खग वृंदों की

टोली निकली गगन नापने ।

मधुपराग में वासंती के

पांव चले हैं समय छापने ।।

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नर्म घास में बेसुध लेटे

सूरज गोधुलीबेला ताके ।

अस्ताचल को देख सेंदुरी

चंदा धरती रह रह झांके ।।

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सर्द रात में ओसबिंदु जब

तन पर बिजुरी बाण चलाए ।

वनगामी का स्वर्ग धरा से

तन लौटे पर मन रह जाए ।।

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मोहन श्रीवास्तव

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