#Kavita by Monu Swami

तब हम किताबें और कापियां फाड़ते थे
जैस एक कम उम्र की औरत
पागलों की तरह अपने प्रेमी की क़मीज़ें फाड़ती है।
बात वहीं पर खत्म होती जाती
जहां से हम कायनात देखते सारी,
देखना;
न देखने का पर्यायवाची था।
एक लड़की रंगोली बना रही थी
मेरे दोस्त के दिल पर
और मैं अकेला खुद को बचाते हुए
आंदोलन में इतना गहरा कूदा
कि चौराहे पर जनता इकट्ठा हुई,
दुआ कीजिए कि
‘जनता’ कोई फूहड़ शब्द नहीं है
और यह भी
कि ‘एक अनार सौ बीमार’ जैसे मुहावरे का अर्थ
सभ्य लोग जानते थे।
यह अमिताभ बच्चन की किसी दिलफेंक फिल्म की तरह घटित हुआ
जब मेरा दोस्त प्यार में डूबा,
इंतज़ार करने का उपकरण मेरे पास होता तो
उदास रसोई में बिल्लियां जूठन का जश्न मनाती पकड़ी जाती
और छत पर टंगी मकडिय़ां सबसे गिरीह नींद सोती।
दुनियां बचाने की फ़िक्र में
कोई झमेला नहीं कर रहीं थी भाषाएँ
मैंने क्रांतिकारियों को कभी प्यार से बोलते नहीं सुना,
जिस क्षण मेरा दोस्त बेवज़ह मारा गया
मैंने फ़टी हुई जेब की जगह देखा
मेरी आत्मा का रंग काला था।
और आप यकीन मानें
प्यार उस वक़्त का एक अनोखा शब्द था
जिसे जब हमने समझने की कोशिश की,
वे स्कूल के दिन थे
और मैं आज भी डरता हूँ
अख़बार के परिवार परिशिष्ट से
जो पुरुष के लिए अलग है, औरत के लिए अलग।
उस वक़्त हमसे कोई बोलता
तो हम सीधे उसकी गिरेबान में धँस सकते थे,
रेलगाड़ियों में कई दफा कुल्फी खाते हुए
मेरे दोस्त समेत कई लोगों ने यह समझा कि
“आत्माएं” भाप से चलने वाले डिब्बों में रहती है
जो किसी पटरियों से जुड़े होते हैं,
उनकी जीभ और होंट उनसे आगे-आगे चलते,
वे ब्रह्माण्ड की स्मृतियों को खोद देते पूरी जिंदादिली से।
ख़ैर,
जैसे-तैसे मैं प्यार को जलाकर वहां से लौटा
तो राष्ट्रगान बज़ा मेरे कानो में
और मुझे लगा कि सावधान खड़े होने पर ये ज़रूरी है
कि हम इस पर गहनता से सोचें
कि आखिर देश के अनगिनत लोगों तक पहुंचने वाला सरकारी भोंपू
कब अपनी परिभाषाएं बदलेगा….
हम उन दिनों में जी रहे थे
जहां
सार्वजनिक शौचालयों से सार्वजनिक चौराहों तक
पागल आदमी उन बैनरों के नीचे खड़े हैं
जिन पर सामाजिक जागरूकता की नई संस्थाओं के
शुभारंभ की घोषणाएं हैं।
और इन सबके दौरान
एक पुरानी खुशबू खिड़की पर झुकी हुई झांक रही होती है
पुरानी गलियाँ
पुरानी लड़कियां
पुराने गीत
पुरानी भूमिकाएं…
अपने नाख़ून चबाती हुई ओझल होती हैं।
मुड़कर देखो, एक बात और…
जब वह मरा तो मैं उसके सिरहाने खड़ा था,
उसने कहा कि एक कविता सुनाओ
प्यार और आत्मा के बारे में
आंदोलनों और क्रांतियों के बारे में
मैं चुप रहा कई देर।
उस दिन आसमान पूरी तरह सफेद था खांड की तरह चिपचिपा,
उस पर लिखा था –
प्यार दरअसल एक चौराहा है।
(पेरुवीयन क्रांतिकारी हिल्डा गेडिया को समर्पित)
– बृजमोहन स्वामी “बैरागी”
[युवा लेखक और आलोचक]

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