#Kavita by Mukesh Bohara Aman

श्रम की देवी

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करीब से देखा है मैंने ,

वो पत्थर-पहाड़ों को ,

अनवरत तोड़ रही है ।

 

बस ! जीने की आस मे ही,

पसीने की बूंद-बूंद से ,

बिखरा जीवन जोड़ रही है ।।

 

मुन्ना कुदरत के ‘झूले’ में ,

मुन्नी थोर की छांव में ,

बेखबर हो खेल रही है ।

 

पर मां की ममता का मोह ,

एक नजर बच्चों पर है तो ,

दूसरी पत्थर झेल रही है ।।

 

एक नजर देखा मैने कि,

वो पत्थर दर पत्थर को ऐसे,

धुन मस्ती में तोड़ रही है ।

 

बस ! जीने की आस मे ही,

पसीने की बूंद-बूंद से ,

बिखरा जीवन जोड़ रही है ।।

 

खामोशी और झुकी नजर में ,

लगे डूबी अगर-मगर में ,

जीवन है अब तिहरे दशक में ।

 

कितना नीरस, कितना पावन,

और उपर से विधवा जीवन ,

है हर एक नजर की शक में ।।

 

दिन में फैली निशा की चादर,

दूर हटाने को वो पल-पल ,

यौवन को झकझोर रही है ।

 

बस ! जीने की आस मे ही,

पसीने की बूंद-बूंद से ,

बिखरा जीवन जोड़ रही है ।।

 

दुरह साधना में लीन है ,

यौवन की इन गालियों में वो ,

बेबस होकर भूल चुकी जो ।

 

झलक पड़ी जब उसको मेरी ,

शर्म की बिजली कौंध गई फिर ,

श्रम की देवी बीच रूकी जो ।।

 

यौवन की फुलवारी कैसी ,

सुख की वो तरकारी कैसी

खुशिया गम की भोर रही है ।

 

बस ! जीने की आस मे ही,

पसीने की बूंद-बूंद से ,

बिखरा जीवन जोड़ रही है ।। कवि मुकेश बोहरा अमन

 

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