#Kavita by Mukesh Bohara Aman

जीवन-यात्रा

 

जीवन के बेगाने गाने ,

गुनगुनाता, आगे बढ़ता जाता हूं ।

मुस्काता हूं, सावन को मुठ्ठी में भरकर,

चलता हूं, फिर गाता हूं ।।

 

सकारात्मक चिंतन संभव ,

पूरे होते मानव के अभीष्ट सभी ।

सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् और ,

प्रसन्न होते ईष्ट सभी ।।

 

मैं उठता हूं अपने पैरों ,

सुमनों को जल दे आता हूं ।

मुस्काता हूं, सावन को मुठ्ठी में भरकर,

चलता हूं, फिर गाता हूं ।।

 

कुछ लोग जहां में हरपल केवल ,

पतझड़ के गाने गाते है ।

इसी तरह की फितरत से ही ,

वे जग जाने जाते है ।।

 

मैं आवारा, बंजारा बन ,

जीवन के गाने गाता हूं ।

मुस्काता हूं, सावन को मुठ्ठी में भरकर,

चलता हूं, फिर गाता हूं ।।

 

मायूसी, लाचारी, खुंदक ,

महज् मन में उठे भाव है ।

मस्त फकीरी जीवन मस्ती ,

मानव का तो यही स्वभाव है ।।

 

घोर हताशा के दिवस भी ,

मांदल जोर बजाता हूं ।

मुस्काता हूं, सावन को मुठ्ठी में भरकर,

चलता हूं, फिर गाता हूं ।।

 

क्या तेरा, क्या मेरा यहां पर ,

सब मिट्टी के ढ़ेले है ।

भीड़, कारवों, अपनों में भी ,

हम सब अमन अकेले है ।।

 

नश्वर जीवन की नैया ले ,

यहां आता-जाता रहता हूं ।

मुस्काता हूं, सावन को मुठ्ठी में भरकर,

चलता हूं, फिर गाता हूं ।।

 

मुकेश बोहरा अमन

गीतकर

राष्ट्रीय कवि संगम, बाड़मेर

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