#Kavita by Mukesh Bohara Aman

गीत

 

सब कहते जग दुख का है घर

 

दुख का रोना, सब रोते हैं

इसमें मैं तुम, सब होते हैं

 

कौन ठहर करता है चिंतन

दुख के दो दुबले पांवों पर ।

सब कहते जग दुख का है घर ।।1।।

 

सुख दुख मन की दो संताने

मन से उपजी, मन ही जाने

 

मन की इच्छाओं के घोड़े

जग में दुख का फैलाते डर ।

सब कहते, जग दुख का है घर ।।2।।

 

इच्छा अपेक्षा के काले घन ,

डुबो दिया करते पावन मन,

 

सब में वक्त बड़ा सच लेकिन

अमन दुख के नहीं होते कर ।

सब कहते, जग दुख का है घर ।।3।।

 

मुकेश बोहरा अमन  , गीतकार  –  बाड़मेर राजस्थान ,

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