#Kavita by Mukesh Bohara Aman

एक गीत

 

जाड़े की विदाई

 

 

बदल रही है अब हवाएं,

जाड़े के दिन जा रहे हैं ।

 

धुंध, आलस सब हटाते,

ग्रीष्म के दिन आ रहे हैं ।।

 

 

कोठी बंगला शहर ढाणी,

दिन बदल रहे हैं गांव में ।

 

आदमी और ढोर, जिनावर,

सब आ रहे हैं छांव में ।।

 

पेड़ों की छत लगे सुहानी,

सर सर पत्ते गा रहे हैं ।

बदल रही है अब हवाएं,

जाड़े के दिन जा रहे हैं ।।

 

 

अब घरों की खिड़कियां सब,

घर को रोशन कर रही है ।

 

छत पंखों की शांत पंखुड़ियां,

आलस सुस्ती हर रही है ।।

 

मां के हाथों की ठण्डाई,

शीतल पेय सब भा रहे हैं ।

बदल रही है अब हवाएं,

जाड़े के दिन जा रहे हैं ।।

 

 

रातें छोटी दिल लंबे और

घर ऑटों, चौपालों फिर से।

 

लौट आती है रौनक, रंगत,

हम चलते है खेतों फिर से ।।

 

घर मुंडेरों पर कबूतर,

फिर से गाने आ रहे हैं ।

बदल रही है अब हवाएं,

जाड़े के दिन जा रहे हैं ।।

 

 

ग्रीष्म, जाड़े की विदाई,

फूल बरसा, कर रहा है ।

 

धीरे-धीरे रात दिन में,

रूप अपना धर रहा है ।।

 

शीत के साधन ‘अमन’ अब,

बंद बक्से जा रहे है ।

बदल रही है अब हवाएं,

जाड़े के दिन जा रहे हैं ।।

 

 

 

मुकेश बोहरा अमन

गीतकार

बाड़मेर राजस्थान

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