#Kavita by Mukesh BoharaAman

एक गीत

 

मोहब्बत की जुबां

 

कभी लहरों को लिखता हूँ ,

कभी शहरों को लिखता हूँ ।

 

मेरी बैचेनी को समझो ,

कभी तारों को लिखता हूँ ।।

 

 

जहाँ में हर तरफ केवल ,

मोहब्बत ही मोहब्बत है ।

 

कलम, कागज, गुलाबों में ,

मोहब्बत की ही शोहरत है ।।

 

कली, फूलों को, तितली को,

कभी भँवरों को लिखता हूँ ।

 

मेरी बैचेनी को समझो ,

कभी तारों को लिखता हूँ ।।

 

न शायर हूँ, न आशिक हूँ  ,

मगर कहते है पागल हूँ ।

 

बरसती है ये आँखें यूँ ,

लगता है कि बादल हूँ ।।

 

कभी गुल को, गुलिस्तां को ,

कभी बहारों को लिखता हूँ ।

 

मेरी बैचेनी को समझो ,

कभी तारों को लिखता हूँ ।।

 

 

जमाने की रवायत भी ,

बड़ी ज़ालिम, अनोखी है ।

 

सिखाती है मोहब्ब्त पर ,

करे तो घोर दोषी है ।।

 

मोहब्बत की जुबां पर यूँ ,

लगे पहरों को लिखता हूँ ।।

 

मेरी बैचेनी को समझो ,

कभी तारों को लिखता हूँ ।।

 

 

मुकेश बोहरा अमन

गीतकार

बाड़मेर राजस्थान

8104123

 

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