#Kavita by Mukesh Kumar Rishi Verma

कलम

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जब विचार कविता का आकार लेने लगते हैं,

तब कलम होकर पैनी, तलवार बनने लगती है |

बगैर एक बूंद रक्त बहाये, अपना काम करने लगती है ||

 

जब जुल्म – सितम की आँधियां कहर ढाने लगती हैं,

तब किताबें ढ़ाल बनकर सुरक्षा देने लगती हैं |

द्वार प्रगति के खोलकर,गुलामी की बेडियां तोडने लगती हैं ||

 

तुम पढ़ो तो सही क्रांति का इतिहास अमर,

निबलों-विकलों के अंदर भी वीरता जन्म लेने लगती है |

कहानी शौर्यभरी खुद-ब-खुद बनने लगती है ||

 

सभ्यतायें जितनी भी हैं अगर अमर तो कलमों के बल से,

परिवर्तन लाती हैं कलमें, बस बिकें न सिक्कों की खनक में |

जिंदा रखना ईमान, कहीं खो न जाना झूंठी सनक में ||

 

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

गॉव रिहावली, डाक तारौली गुर्जर,

फतेहाबाद -आगरा, 283111

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