#Kavita by Mukesh Kumar Rishi Verma

अकड़

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अकड़ आदमी-आदमी में भरी है

किसी में धन की तो

किसी में बल की /

किसी में सुन्दरता की /

किसी में ज्ञान की /

किसी में पद की /

किसी में तन की…

लेकिन सच तो यह है

अकड़ सिर्फ मुर्दों में होती है

ये जिंदा आदमी मुर्दों की होड़ कब से करने लगा

झूठा अहंकार भरने लगा |

 

छोड़ दे ये झूठी अकड़

धर्म की /

जाति की /

पंत की /

गोरे की /

काले की /

लम्बे की /

ठिगने की…

अकड़ तो एक न एक दिन आनी ही है

वो भी बिन बुलाए

तो क्यों अभी से पाल बैठा है

जिंदा है तब तक तो इससे दूर रह…

 

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

ग्राम रिहावली, डाक तारौली गुर्जर,

फतेहाबाद, आगरा, 283111

 

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