#Kavita by Mukesh Madhuram

श्रद्धा ही जीवन का सूरज

श्रद्धा विश्व को देन है पूरब

 

श्रद्धा क्या है एक सघन इच्छा

श्रद्धा ही समर्पण की तितिक्षा

 

श्रद्धा क्या है हृदय का पवित्र भाव है

श्रद्धा ही अखिल ब्रह्माण्ड फैलाव है

 

श्रद्धा क्या एक प्रसन्नता का नाम है

श्रत् में धा यौगिक सत् धारण धामहै

 

श्रद्धा क्याहै मानवीय चेतना मूल शक्ति

श्रद्धा ही  है मानस  प्रतिभा अभिव्यक्ति

 

श्रद्धा क्या है एक आदर भाव और आस्था

श्रद्धा से ही है स्नेह सम्मान मनोभूमि का वास्ता

 

श्रद्धा क्या है जीवनअवरोध चक्रव्यूह भेदने पाने की शक्ति

श्रद्धा ही है अन्तःकरण घनीभूत भाव सम्वेदना अनुरक्ति

 

भवानी  शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणो तुलसी  ने पाया

श्रद्धा और विश्वास से ही था हर  सत् द्रष्टा योगी कहलाया

 

आत्मशक्ति अनुभूति के दो सम्बल श्रद्धा और विश्वास

हो प्रेरक प्रणम्य जीवन फैले व्यक्तित्व कीर्ति चन्दन सुवास

 

वैसा ही मानुष बन जायेंगे हम जैसी अपनी श्रद्धा होगी

वीर बनेंगे कि महावीर बनेंगे पर जैसी अपनी श्रद्धा होगी

 

श्रद्धा की शक्ति से सीखे  एकलव्य ने अद्भुत तीर चलाये

श्रद्धा की भक्ति से हनुमन्  द्रोणागिरि पर्वत उखाड़ ले आये

 

श्रद्धा थी प्रह्लाद कि भगवन् नरसिंह खम्भ अवतरित हो आये

श्रद्धा के पराक्रम से सवा लख से एक लड़ा गुरु गोविन्द सिंह कहाये

 

श्रद्धा  की शक्ति थी कि लंका में अंगद पैर कोई हिला न पाया

श्रद्धा की भक्तिन थी मीरा कि विषपान न कुछ कर पाया

 

श्रद्धा थी गुरु में कि विश्वमें विवेकानन्द ने वैदिक सन्देश पहुँचाया

श्रद्धा के भावों से वानर सेना ने श्रीराम नाम पत्थर जल में तैराया

 

लाखों लाख हैं आख्यान पर क्यों अब अपने जीवन से श्रद्धा रूठी

क्यों हृदय सम्वेदना सूख रही क्यों जीवित आनन्द की आशा टूटी

 

इस युग की औषधि है श्रद्धा युगपीड़ा परित्राण है श्रद्धा

बुद्धिवाद से पीड़ित  आधुनिक मानव  का उद्धार श्रद्धा

-मुकेश मधुरम्

 

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