#Kavita by Naaz Ozair

आरक्षण

आरक्षण का खेल ये भैया आरक्षण का खेल,
अफसर बाबू बना हुआ है कल का मैट्रिक फेल।

तुम ही बताओ हम कहाँ जाएँ माता पिता को क्या मुंह दिखाएँ,
देखें थे जो उंहोंने सपने कैसे उसे साकार बनाएँ,
जीत के भी हम हार गए हैं आरक्षण का खेल।
आरक्षण का खेल …..

दूर तलक घनघोर अंधेरा चारों तरफ है जुल्म का डेरा,
कब निकलेगा खुशियों का सूरज कब आयेगा नया सवेरा,
आरक्षण के आगे अपनी हर कोशिश है फेल।
आरक्षण का खेल …….

थाना-पुलिस अपनी सौतन कोट कचहरी भी है दुश्मन,
नेता जी को फिक्र है कैसे जीते हम अगला एलेक्शन,
आरक्षण के कैदी हैं हम कौन कराये बेल।
आरक्षण का खेल …….

आरक्षित ने थर्ड डिविजन से इंटर को पास किया है,
फिर भी सरकारी संस्था में देखो जॉब मिला है,
और हम B.A , M.A करके बेच रहे हैं तेल।
आरक्षण का खेल ……

जुल्म तुम्हारा अब न सहेंगे जान लगी तो जान भी देंगे,
चाहे जो कीमत हो चुकानी अपना  हक हम लेके रहेंगे,
अब रिचार्ज न होने देंगे आरक्षण का सेल।
आरक्षण का खेल …..

नाज़ ओजै़र नाज़

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