#Kavita by Naaz Ozair

पापी पेट

शिक्षक बनके ज्ञान की गंगा देखो कोई बहाता है,
इंजिनियर बन करके कोई चाँद की खबरें लाता है,
डॉक्टर बनके इंसानों का कोई जान बचाता है,
पोएट बनके कोई सुरों के सरगम में खो जाता है ।

पेट के कारण सब होता है बच्चों पेट महान,
पेट इबादत,पेट है पूजा,पेट ही है भगवान।

बढ़ई बनके कोई लकड़ी का सामान बनाता है,
बुनकर बनकर के हम सब को कपड़े कोई पहनाता है,
लोहे को पिघला करके लोहार औजार बनाता है,
लेखक हमको घर बैठे दुनिया की सैर कराता है।

सब रोटी का खेल है बच्चों रोटी धरम – ईमान ,
पापी पेट से बढ़के बच्चों नहीं कोई शैतान।

पीअन बनके ऑफीसर बाबू का कोई नाज उठाता है,
नाटककार कोई बन करके दिल सब का बहलाता है,
कुली बनके कोई इस दुनिया का बोझ उठाता है,
चीर के इस धरती का सीना फार्मर अन्न उपजाता है।

पेट के चक्कर में घन चक्कर नाज  है ये संसार,
पेट की लीला होती है ऐ बच्चों अपरमपार।

नाज ओजैर

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