#Kavita by Naaz Ozair

बुढ़ापा

हुई है ख़त्म लो अब , जवानी की कहानी ,
बुढ़ापा क्या है सुन लो, बुढ़ापे की जबानी ।

चमक आँखों की धुंधली, लो अब होने लगी है ,
तमाशा ज़िन्दगी अब , मेरी बन्ने लगी है ।

मेरे  बालों पे भी अब , सफेदी आ गयी है ,
सभी कहते हैं मुझपे , ज़ईफी   आ गयी है ।

दिवाली ,ईद ,होली, हो चाहे कोई मौसम ,
नहीं भाता है दिलको ,कोई खुशियों का सरगम ।

है मेरा बोझ ढोने ,से मेरे पांवो आजिज़ ,
ये हाले दिल करूँ मैं ,भला किस-किस पे ज़ाहिर ।

दमाग़ अपना नहीं अब,रहा अपने ठिकाने ,
मेरे ये हाथ भी अब, लगे हैं  कपकपाने ।

मेरी आँखों से नींदे ,भी अब रूठी हुई हैं ,
उम्मीदें जिन से की थीं , सभी टूटी हुई हैं ।

मेरे चारों तरफ हैं ,अँधेरे ही अंधरे ,
ज़माना हो गया है,मुझे आईना देखे ।

मेरी नज़रों में सपना ,कोई पलता नहीं अब ,
ख़ुशी का दिप दिल में, कोई जलता नहीं अब ।

दिया में तेल है अब, न ऊसमें कोई बाती ,
मेरी तन्हाईयों का ,नहीं है कोई साथी ।

नहीं जीने की ख़ाहिश ,मैं फिर भी जी रहा हूँ ,
गिरेबां चाक अपना ,मैं खुद ही सी रहा हूँ ।

यही सब बैठे-बैठे ,मैं अक्सर सोचता था ,
सिरा इन मुश्किलों का, हमेशा ढूंढता था ।

अचानक ज़ेहनो-दिल  में, मेरे बिजली सी कुंदी ,
अभी है पास मेरे, बची साँसों की पुंजी ।

बुढ़ापा है हक़ीक़त ,उसे आना ही होगा ,
जो आया है यहाँ से ,ऊसे जाना ही होगा ।

ख़याल अाते  ही इतना ,हुई हर राह  रौशन ,
बुढ़ापा बोझ था जो, लगी लगने वह दुल्हन ।

खताएं बख्स  वाता ,हूं  अब सजदे में जाके ,
खुद का शुक्र करता, हूं  रुखी -सूखी  खाके ।

बुढ़ापे पे जवानी ,लो देखो लाैट आयी ,
बहुत खुश रहता हूं  अब, ऐ मेरे नाज़ भाई ।

नाज़ ओजै़र नाज़

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