#Kavita by Nand Lal Suthar

बचपन

 

भाग दौड़ भरे इस जीवन में

जब आंखों को बंद करता हूं

सोचता हूं

जीवन के बारे में

कैसा रहा

सफर ये मेरा

क्या किया है मैने खास

क्या रहा सुनहरा जीवन में

सोचता हूं।

 

सोचता हूं

बचपन जो मेरा

रहा बड़ा ही खास

कूदते थे

खेलते थे

डर के ही सही

मन से ही सही

पलटते थे

पन्ने किताबो के।

सोचता हूं

पल वो सुनहरे थे मेरे जो खास

सोचता हूं वो आ जाये वापस काश!

 

लेकिन आज हलचल सी मच गई

इस शांत समुद्र से मन मे

आज तूफान आ गया है

इस शांत से मन मे

बचपन का मेने रूप देखा

शहर की एक होटल में

बचपन कुचल रहा था जहाँ

आखों के मेरे सामने।

 

सोचता हूं

जब उसकी उस

भोली सूरत के बारे में

जो कांप रहा था

मालिक की

इक आवाज लगाने में

हाय! ऐसा बचपन है

इस शहर के हर मुहाने में।

नन्दलाल सुथार  रामगढ़, जैसलमेर(राज.)

 

One thought on “#Kavita by Nand Lal Suthar

  • March 18, 2018 at 12:02 pm
    Permalink

    Heart touching….

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