#Kavita by Narendra Ranawat

पड़ती है एक बूँद
पर्वत की चोटी पर
सोचती है कोई आये
मिले मुझसे भी
वहीँ बरसात की
बूंदे
आ टपकती है
उस पर
समर्पण भाव से
बहकर
झरने सी
झर झर
नही रूकती कही भी
कई पड़ावों से
झुझ कर
गुजर जाती है
उन पर्वतो से
निर्माण
कर एक नदी का
बह जाती है
धरातल के आँचल पर

नरेंद्र राणावत मूली चितलवाना +9784881588

5 thoughts on “#Kavita by Narendra Ranawat

  • September 12, 2018 at 5:26 am
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    Bahut Khub…Sundar Rachnaa h

  • September 12, 2018 at 5:29 am
    Permalink

    Bhut Shandar rchna

  • September 12, 2018 at 6:11 am
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    बहुत बढ़िया भावपूर्ण रचना सर

  • September 12, 2018 at 6:13 am
    Permalink

    बहुत बढ़िया भावपूर्ण रचना सर जी

  • September 12, 2018 at 8:47 am
    Permalink

    Exactly finest poem progress in life work is fruit.

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