#Kavita by Narpat Parihar

कुछ सीख रहा हूॅ मै—-

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पृथ्वी से,

फलो से लदे पेङो से,

कल-कल करती नदियों से,

ऊँचे-ऊँचे पर्वतो से,

निस्वार्थ व परोपकार के भाव, सीख रहा हूॅ मै

इन सब से।

 

कुछ सीख रहा हूॅ मै ,

मेहनतकश किसान से ,

दो बैलो की जोङी से,

दिन दिहाङी मजदूर से,

मेहनत व संघर्ष करना सीख रहा हूॅ मै

इन सब से।

 

कुछ सीख रहा हूॅ मै

बच्चे की दन्तुरित मुस्कान से ,

कलियो के खिलने से ,

उन पर तितलियो के उङने से ,

मुस्कराना सीख रहा हूॅ मै इन सब से।

 

कुछ सीख रहा हूॅ मै

माँ की ममता से ,

पापा के प्यार से ,

भाई-बहिन के स्नेह से ,

प्रेम व स्नेह का भाव मै सीख रहा हूॅ मै

इन सब से।

 

कुछ सीख रहा हूॅ मै

कोयल की मधुरमय कूक  से,

सप्त सुरो की सरगम से,

मधुर वाणी मै सीख रहा हूॅ इन सब से।

-नरपत परिहार(व्याख्याता, हिन्दी)

वणधर, रानीवाङा

9166412907

2 thoughts on “#Kavita by Narpat Parihar

  • June 22, 2018 at 4:48 pm
    Permalink

    Really …
    Heart touching poem..

  • June 24, 2018 at 1:40 pm
    Permalink

    Super sir
    Ham bhi sikh rahe hai aapse sir ji

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