#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

नीरस जिन्दगी

 

जिन्दगी नीरस हो चली है

आशाएं धूमिल होने लगी हैं।

मगर फिर भी जाने क्यों ?

डोर जीवन की बंधी है ।

 

साहित्य की क्या खोज करूँ

खुद जीवन मेरा खोया है

क्या मैं कोई कविता लिखूँ

खुद अन्तर्मन मेरा रोया है

 

सोचता हूँ तभी आज मैं

क्यों अश्रुधारा बह चली है।

मगर फिर भी जाने क्यों ?

डोर जीवन की बंधी है ।

 

आँखों में अश्रु हाथ में कलम

लिखना क्या है मुझको ये

पता भी नही है सनम

तभी तो बार-बार जहन में

 

उठता है सवाल जिन्दगी का

यादें पुरानी मिट चली हैं ।

मगर फि र भी जाने क्यों ?

डोर जीवन की बंधी है ।

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नवल पाल प्रभाकर

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