#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

इंसान

 

मुट्ठी भर खुशियों की खातिर

छटपटाता इंसान

अरमानों के आईनों में

बालू से घर बनाता इंसान।

यह वह नही जानता।

कि……………………….

उसका यह घर

ढह जाएगा एक दिन

बिखर जाएंगे इसके हर कण

हो जाएगा एक दिन चूर

ये खुशियां होती हैं थोड़ी

इकट्ठा करता है जिन्हें वह चुन

ये वो कलियां हैं जो एक दिन

मुरझा जाएंगी।

ये वो स्वप्निले स्वप्न है।

जो जायेंगे एक दिन धुल

खुशी से अच्छा तो दुख है

हमेशा साथ रहता है जो

ये वो कलियां ओर

स्वप्निले स्वप्न नही

ये वो कंटीले सूखे कांटे

ओर तेज धार तलवार है।

जिन पर हमेशा चलना है।

-ः0ः-

 

नवलपाल प्रभाकर ‘दिनकर’

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