#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

लटों में

 

लटों में अपने मत उलझा

लक्ष्य से भटक जाऊंगा।

आंखों को बंद कर ले तु

लहरों में ना तैर पाऊंगा।

 

यूं ना मुझको रोक तु

मंजिल मेरी बहुत दूर है

मंजिल की राह कठिन

तुझे साथ ना ले जाऊंगा।

 

लटों में अपने मत उलझा

लक्ष्य से भटक जाऊंगा।

 

अच्छा लगता नही मुझे

तेरे बिन अकेले जाना

पर करूं क्या मैं प्रिये

अकेला ही वहां मैं जाऊंगा।

 

लटों में अपने मत उलझा

लक्ष्य से भटक जाऊंगा।

 

तुझसे मिलूंगा जरूर कहीं

इन रास्ते टेढे-मेढों पर

करके काम पूरा अपना

पास तेरे मैं आ जाऊंगा।

 

लटों में अपने मत उलझा

लक्ष्य से भटक जाऊंगा।

 

लम्बी जुदाई के कारण

भूल ना जाना तुम प्रिये

रात को सोते वक्त मैं

ख्वाबों में तुम्हारे आ जाऊंगा।

 

लटों में अपने मत उलझा

लक्ष्य से भटक जाऊंगा।

 

जुदाई के बाद ही मेल का

होता है आनन्द न्यारा

उसी आनन्द की खोज में

मैं पास तुम्हारे आ जाऊंगा।

 

लटों में अपने मत उलझा

लक्ष्य से भटक जाऊंगा।

-ः0ः-

नवलपाल प्रभाकर दिनकर

 

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