#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

पानी की बूंद ।

 

हां मैं मानती हूं।

देखने में मेरी हस्ती

क्या है ?

कुछ भी नही।

आग पर गिरूं

जलकर भाप बन उंडूं,

धरा पर गिरूं

हर प्यासा रोम

अन्दर अपने मुझे सोख ले

जो गिरूं किसी ताल में

लहरों में बिखर-बिखर

छम-छम कर लहरा उठूं।

इतना कुछ होने पर भी

मेरा एक अलग नाम है।

मेरी एक अलग पहचान है।

वर्षों पुरानी मेरी दास्तान है।

जो आज यहां पर बयान है।

जब तपती है धरा तो

टकटकी बांधकर लोग मुझे

नीले साफ आसमान में

बस मुझे ही हैं ढूंढते

तब मैं काले-सफेद बादल बन

गिर पड़ती हूं छाज भरकर।

दानों रूपी बूंदों को

जो पेड़ पौधों की जड़ों को

सींचता हुआ चला जाता है

जब मानव परेशान होकर

बैठ जाता है तब उसकी आंखों में

मैं उमड़ पड़ती हूं।

कल-कल करती जब बहती हूं।

तब रूप मेरा सुन्दर हो जाता

ओर इकट्ठा होकर बहती हूं कहीं

अपने अन्दर समेट कर सबकुछ

बह निकलती हूं।  –  नवलपाल प्रभाकर दिनकर

 

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